चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि वीरभद्र ने कहा- स्नेह का बंधन जिसमें कोई धागा नहीं होता फिर भी हम बंधा महसूस करते हैं
राजनांदगांव। जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि स्नेह का बंधन ऐसा होता है जिसमें कोई धागा नहीं होता फिर भी व्यक्ति अपने आपको बंधा हुआ महसूस करता है, कोई पिंजरा नहीं होता, कोई सलाखें नहीं होती फिर भी व्यक्ति अपने आपको बंधा महसूस करता है। वह इस स्नेह बंधन से निकल नहीं पाता।
जैन बगीचे में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि एक पक्षीय राग करने से व्यक्ति को दुखी होना पड़ता है। हम छोटी-छोटी मान्यताओं का राग लेकर बैठ गए हैं। एक निश्चित समय तक यह राग रहेगा, उस वस्तु के प्रति हमारा आलंबन रहेगा फिर यह राग/ आलंबन हट जाएगा। उन्होंने कहा कि आप कभी चिंता करके देखें कि आप कितने वितरागी हो। कभी चिंता करें कि मैं कितना वितरागी हुआ। वितरागिता के प्रति कितना आगे बढ़ा। वितरागिता बढ़ने पर कोमल बिस्तर भी कांटों भरे लगने लगतें हैं, लजीज खाना भी नहीं भाता।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि भगवान के प्रति निःशर्त समर्पण भाव होने से अनंत उपलब्धि प्रकट हो जाती है। उन्होंने कहा कि हम भंगार को भी त्याग नहीं पाते!हम राग में इतने जकड़े हुए हैं कि हम किसी भी चीज का त्याग इतनी आसानी से नहीं कर पाते तो हम शासन के प्रति उदारता कैसे दिखा पायेंगे। उन्होंने कहा कि अपने भीतर वितरागिता को बढ़ाना होगा तभी हम आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ पाएंगे, नहीं तो राग के बंधन में ही बंधे रह जायेंगे। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
