चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि वीरभद्र ने कहा- ब्रम्हचर्य साधना की रीढ़ होती है
राजनांदगाँव। जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि जीवन ऐसा होना चाहिए कि लोगों को आपके आचरण से प्रेरणा मिले। लोग आपका अनुसरण करें। साधु का आहार पर नियंत्रण होना चाहिए।
जैन बगीचे में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि सच्चा साधु धन वैभव के प्रति मोह नहीं रखता। ब्रह्मचर्य साधना की रीड़ होती है। साधु अपने पास अच्छी वस्तु या संपत्ति के संग्रहण की लालच नहीं रखता। उन्होंने कहा कि राजा ऐसा होना चाहिए जो सर्व जीवो को अभय दान दे।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि संवाद में विराम कभी नहीं होना चाहिए। संवाद से अनेक भ्रांतियां दूर होती है। व्यक्ति सरल रहे और संवाद चलता रहे तो अनेक गलतफहमियां दूर की जा सकती है तथा संबंध भी मजबूत होते हैं। उन्होंने कहा कि मन को और वचन को साधना चाहिए। मन को भटकने से रोकना चाहिए और वचन को सोच समझ कर बोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि मन को एकाग्र करो और आराधना कर आत्म कल्याण की ओर आगे बढ़ जाओ। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
