लोगों ने चार माह के अनुभव को साझा किया और गीतिका के माध्यम से भाव प्रकट किया
जैन श्री संघ के अध्यक्ष मनोज बैद ने बताया – मुनि वृंद 7 नवम्बर को प्रस्थान करेंगे
राजनांदगांव। आभार प्रदर्शन के साथ ही आज चातुर्मास का समापन हुआ। समाज के लोगों ने अपने 4 माह के अनुभव का साझा किया और गीतिका के माध्यम से आभार प्रदर्शन करते हुए अपनी भावनाएं प्रकट की।
श्री जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ एवं चातुर्मास समिति की ओर से मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि मुनि वृंद स्थान परिवर्तन हेतु 5 नवंबर को सत्यम विहार स्थित प्रभात एवं मेहुल कोटडिया के निवास में जाएंगे तथा 6 नवंबर को वापस जैन बगीचा स्थित उपाश्रय भवन पहुंचकर सुबह 8:45 से 9:45 बजे तक अंतिम प्रवचन देंगे और 7 नवंबर को वे ठेकुआ की ओर प्रस्थान कर जाएंगे।
सकल जैन श्री संघ के अध्यक्ष मनोज बैद एवं चातुर्मास समिति के संयोजक प्रदीप गोलछा ने बताया कि भूमिका कोठारी की गीतिका से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद किरण कोठारी, ज्योति चौरडिया, नवीन झाबक, गुणवंती गोलछा, हर्षा गोलछा, श्रद्धा बोथरा, डॉ पायल झाबक, डॉ श्रीकांत पारख, शांता कोटडिया, अंजली बोथरा, प्रिया कोठारी आदि ने गीतिका एवं उद्बोधन के माध्यम से अपने भाव प्रकट किये। अजय बैद ने संघ की ओर से भाव भरा गीत “विराट में अगर तप को जोड़ दो, वीतराग बन जाता है” प्रस्तुत कर लोगों को भाव विभोर कर दिया।
सकल जैन श्री संघ के अध्यक्ष मनोज बैद ने अपने उद्बोधन में कहा कि चार माह का समय कैसे बीत गया, यह पता कि नहीं चल पाया। उन्होंने मुनि भगवंतों से करबद्ध प्रार्थना की कि वे धर्म और आत्मा के उत्थान का बीजारोपण करते रहें। चातुर्मास समिति के संयोजक प्रदीप गोलछा ने अपने उद्बोधन में चातुर्मास की व्यवस्था हेतु किए गए प्रयास के बारे में विस्तार से जानकारी दी और बताया कि किस तरह विभिन्न समितियां गठित कर युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी गई, जिनके साथ मिलने के बाद आज यह चातुर्मास सफल हो पाया। कार्यक्रम का संचालन रितेश लोढ़ा ने किया।
समिति के निर्मल बैद एवं दिनेश लोढ़ा ने बताया कि अंत में वीरभद्र (विराग) मुनि ने कहा कि 3 वर्ष पूर्व उन्हें पहली बार राजनांदगांव आने का मौका मिला। इसके बाद में 2023 में भी आए और 29 दिन यहां रुके। छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा स्वाध्याय, ज्ञान, सिद्धि तप इस संस्कारधानी में ही हुआ है। उन्होंने कहा कि रामायण से यदि राम गायब हो जाए तो क्या होगा? इसी तरह का हाल जीवन में स्वाध्याय और आचरण गायब हो जाने से होगा, इसीलिए यह दोनों चीजें हमारे जीवन में बहुत जरूरी है। चातुर्मास के दौरान हमारी आत्मा में कितना परिवर्तन आया, इसका आंकलन हमें करना है। उन्होंने कहा कि इच्छा और अपेक्षा यह दोनों ऐसे कांटे हैं जो ह्रदय को लगातार पीड़ा देते रहते हैं, इसलिए इच्छा और अपेक्षा इन दोनों से दूर रहकर आत्म कल्याण के मार्ग में बढ़ने का प्रयास करते रहें।
