चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि वीरभद्र ने कहा- संपूर्ण व्यक्ति बनने के लिए प्रमाद का हटना जरुरी
राजनांदगांव। जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि किसी भी कुएं को खाली करने से पहले उसका जल स्रोत बंद करना होता है तभी वह कुआं खाली हो सकता है। इसी तरह संपूर्ण व्यक्ति बनने के लिए प्रमाद का हटना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रमाद हटेगा तभी मनुष्यत्व की भावना जीव के भीतर आ पाएगी और वह संपूर्ण रूप से मनुष्य बन पाएगा।
जैन बगीचे में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जो समता का पालन करता है वह श्रावक होता है। गुरु को पूछे बिना कोई कार्य नहीं करना चाहिए। शुद्ध होने के लिए ज्ञान, चारित्र और तप ये तीन रास्ते हैं। आराधना करने से जीव को गति मिलती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक प्रमाद होता है। चारित्र लेने के बाद प्रमाद को हटाना बहुत आवश्यक है। प्रमाद अर्थात विषय, व्यसन,कषाय, निद्रा यह सभी आराधना में बाधक है। उन्होंने कहा कि साधु विषय में भटक जाता है। व्यसन में फंस जाता है और कषाय अर्थात मोह, माया, लोभ से घिर जाता है और निद्रा उसे आराधना करने नहीं देती, इसलिए प्रमाद का हटना जरूरी है।
वीरभद्र (विराग) मुनि ने कहा कि मन के परिणामों को निर्मल बनाकर रहना है। मन जितना शांत और निर्मल होगा, हम आराधना के मार्ग में उतने ही आगे बढ़ते जाएंगे। हमें सावधान भी रहना होगा और अपने आपको प्रमाद से मुक्त रखकर मोक्ष के मार्ग में आगे बढ़ना होगा। हमें दुर्जनों और हिंसा का साथ छोड़ देना होगा तभी हम मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ पाएंगे। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
