मेरे संपादक सुनील कुमार जी ने देश के जाने माने साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल जी की सेहत को लेकर सोशल मीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसकी धज्जियां उड़ाते हुए इसकी तुलना एक अमरीकी फोटोग्राफर की अफ्रीका की भुखमरी को लेकर खींची गई उस तस्वीर से की है जिसमें , ‘एक बच्चा भूख से मरने की कगार पर है,उसके पीछे कुछ कदम दूरी पर एक गिद्ध बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहा है,और एक अमरीकी फोटोग्राफर ने यह भयानक पल कैमरे में कैद करके दुनिया के सामने अफ्रीका के अकाल और भुखमरी को पेश किया था।’
सुनील जी ( मेरे लिए भैया ) ने लिखा – बाद में उस फोटोग्राफर से बची पूरी जिंदगी यह सवाल होते रहा कि फोटो खींचने के अलावा उसने मौत के करीब पहुंचे उस भूखे बच्चे के लिए क्या किया ? ’
अपनी इस टिप्पणी में सुनील भैया ने मुझे लेकर भी लिखा है। इसकी शुरुआत उन्होंने इस बात से की है – ‘मुझे ऐसा लग रहा है कि विनोद कुमार जी की असल मदद के बजाए अलग–अलग लोगों के एजेंडा के गिद्ध उन पर मंडरा रहे हैं ।’
इसके तुरंत बाद उन्होंने मेरे नाम का जिक्र किया है तो मुझे लगता है कि मुझे अपने पत्रकारिक मार्गदर्शक , वैचारिक ताकत और सबसे प्रिय संपादक को यह बताना ही चाहिए कि कम से कम मैं ना गिद्ध हूं , ना मेरा कोई एजेंडा है !
मैंने कुल तीन पोस्ट्स लिखी हैं। पहली 8 दिसंबर को तब जब मैं साथी पत्रकार सुदीप ठाकुर Sudeep Thakur के साथ विनोद जी को देखने पहली बार तब गया जब वे icu से बाहर आ गए थे– कुछ मिनट के लिए ही।
उनके पुत्र शाश्वत जानते हैं कि अभी तक हम उनसे यह कहते हुए सिर्फ फोन पर बात करते रहे थे कि हम लोग अस्पताल में भीड़ नहीं बढ़ाना चाहते।
विनोद जी और मेरे पिता स्व.यतेंद्र कुमार गर्ग के भी नजदीकी रिश्ते थे। वे मेरे लिए पिता तुल्य भी हैं लेकिन ना तो मैं निजी चीजों को ना अपनी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना पसंद करता न मैं शोहरतमंद हूं – सुनील भैया से ज्यादा इसे कोई जानता भी नहीं होगा।
रही बात एजेंडा की तो मेरा एजेंडा बिना लुका–छिपी के बहुत साफ है और ताजा संदर्भ में इतना तो है ही कि विनोद जी स्वस्थ हों,सकुशल घर लौटें।
मेरी दूसरी पोस्ट 9 दिसंबर की थी जिसमें मैंने लिखा था कि यह सुखद है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय विनोद जी से मिलने एम्स पहुंचे।
इसमें यह आग्रह था कि यदि परिवार की सहमति हो और चिकित्सक भी सहमत हों तो विनोद जी को देश के किसी बड़े चिकित्सकीय संस्थान में इलाज के लिए ले जाना चाहिए।
इस पोस्ट में मैंने #aiimsraipu रायपुर एम्स और उसके चिकित्सकों के प्रयत्नों के लिए लिखा कि वे पूरी चिंता के साथ उनकी देख–रेख कर रहे हैं।
मेरा आग्रह मुख्यमंत्री जी #CMOChhattisgarh से भी था ।
मैंने लिखा था कि यदि ऐसा होता है तो यह साहित्य बिरादरी के लिए बहुत संतोष की बात होगी।
मैंने क्या गलत लिखा था ? ना तो इसमें एजेंडा था ,ना शोहरत पाने की आकांक्षा।
मैंने इसी पोस्ट में लिखा था कि शहर के एक बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल के संचालक Sandeep Dave डॉ.संदीप दवे ने बिना किसी शुल्क के अपने अस्पताल में उनके इलाज का प्रस्ताव रखा है।
मैंने अपनी पोस्ट्स में इस बात का पूरा ध्यान रखा कि रायपुर एम्स किसी भी तरह के आरोपों के दायरे में ना आए क्योंकि आम जनता की सेहत का बोझ तो ऐसे सरकारी अस्पताल ही उठाते हैं।
फिर तीसरी पोस्ट अभी एक दिन पहले 18 दिसंबर को तब लिखी जब विनोद जी की सेहत से जुड़ी बहुत विपरीत जानकारियां मिलीं।
शहर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक , सामाजिक कार्यकर्ता और विनोद जी से पारिवारिक तौर पर जुड़े Sanket Thakur डॉ.संकेत ठाकुर ने तो इनमें से बहुत सी चीजों को विस्तार से लिखा है और इससे सत्ता प्रतिष्ठानों में भी खलबली मची।
जाने–माने संविधानविद Kanak Tiwari कनक तिवारी जी तो लगातार लिख ही रहे हैं।उन्होंने अपना ही उदाहरण साझा किया कि कैसे तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने तत्काल फैसला लिया और उनकी जान बचाई।
इनमें से किसी ने भी क्या गलत किया ?
क्या ये सब , जो व्यक्तिगत और नागरिक चिंताओं के भी कारण, समाज के सामने सच को लाते रहे, गिद्ध की श्रेणी में रखे जाने योग्य हैं ?
जो लोग आए दिन विनोद जी के साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट कर खुद को बड़ा बनाते रहते हैं उनके बारे में मैं नहीं जानता लेकिन मैंने कभी भी अपने आपको इतना योग्य नहीं पाया कि उनके जैसे संकोची और सहज स्वभाव के व्यक्ति पर जबरन लद कर खुद को बड़ा करना चाहूं! बल्कि यह अच्छा ही है कि ऐसी चीजें समाज दर्ज करता है।
विनोद जी को लेकर मेरी चिंता निजी है,सामाजिक है,पत्रकारिक भी है।
क्या मुझे यह सवाल नहीं करना चाहिए कि क्यों नहीं विनोद जी की सेहत का नियमित अपडेट अखबारों और चैनल्स पर आता रहे ? क्यों नहीं उनकी सेहत के साथ लापरवाही की जो आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं उन्हें लेकर अस्पताल प्रबंधन और सरकार से सवाल पूछे जाएं ?
या क्यों नहीं उन्हें समय रहते देश के किसी बड़े संस्थान में इलाज के लिए भेजा गया ? या क्यों नहीं वरिष्ठ चिकित्सकों की टीम गठित कर उनकी सेहत की लगातार निगरानी का इंतजाम किया गया ?
मुझे जो करना है वो बिना ढोल पीटे अपनी सीमित क्षमताओं में मैंने किया।
शहर के वरिष्ठ चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता,कांग्रेस की चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष Rakesh Gupta डॉ. राकेश गुप्ता खुद एक सलाहकार की तरह तथा एम्स व परिजनों के बीच एक पुल की तरह मौजूद थे – बिना गिद्ध बने!
भैया मैं आपसे हकीकत साझा करना चाहता हूं।
हकीकत यह है कि विनोद जी के जिस विश्वस्तरीय इलाज के दावे किए गए थे उसमें चूक हुई है।
इस बात में चूक हुई है कि जिन्हें धरोहर कहा गया, धरोहर की तरह उनकी चिंता नहीं हुई – तब भी जब देश के प्रधानमंत्री ने उनकी चिंता की,तब भी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री उन्हें देखने गए ।
यह कहना अगर एजेंडा है तो इसे स्वीकार करने में क्या संकोच।
यह तो सबसे आसान तोहमत होती है कि किसी की चिंता की ब्रांडिंग एजेंडा की तरह कर दी जाए तो सबसे ज्यादा खुश सत्ता प्रतिष्ठान ही होता है । हो रहा है।
मुझे अगर शोहरत की तमन्ना होती तो मैं उस किस्से को लिखता जब करीब पच्चीस या तीस बरस पहले आपके सानिध्य में रिपोर्टिंग करते हुए मैंने छुरे बाजी में घायल एक युवक को डीके अस्पताल में पहले खून दिया फिर खबर लिखी। तब वह तस्वीर भी सामने नहीं आई थी कि फोटोग्राफर को पहले मरणासन्न बच्चे की फोटो लेनी थी या बच्चे को बचाना था।
रिपोर्टिंग करते हुए हर पत्रकार के जीवन में ऐसी घटनाएं होती हैं ।आपसे ही पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त एक साथी पत्रकार रवि नामदेव ने एक्सीडेंट में घायल युवक को पहले अस्पताल पहुंचाया और रास्ते में फोन–इन कर खबर भी दी।
आपके ही निर्देश पर मैंने रायपुर की डॉक्टरी पर नौ किस्तों में रिपोर्ट की थी। उन रिपोर्ट्स में कितने सारे उदाहरण चिकित्सकीय लापरवाही के थे,यह आज भी लोगों को याद है।बल्कि आज ही मैंने फेसबुक पर उस रिपोर्ट का जिक्र देखा।
इसे मैं आपसे कहूं यह मेरे लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी की बात है। लेकिन इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि इस मामले में आपके हस्तक्षेप ने एक ऐसा नैरेटिव खड़ा कर दिया है कि मानो विनोद जी के साथ सब कुछ अच्छा ही हो रहा है और कुछ लोग बस अपने एजेंडा के तहत गिद्धों की भांति मंडरा रहे हैं !
यह सच नहीं है।
सच अस्पताल जाने पर मालूम होगा लेकिन मुख्यमंत्री के सलाहकार के बयान/पोस्ट को खबर बनाने वाले पत्रकार मित्र भी इस अवसर से चूक गए कि एक बार अस्पताल जा कर वस्तुस्थिति का जायजा ले लेते ।
मेरी राजनीतिक,सामाजिक,पत्रकारिक प्रतिबद्धता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ काम किए हुए दिनों का जिक्र कर के इस गंभीरता को डाइल्यूट करने की कोशिश तो की जा सकती है और सत्ता को ऐसी कोशिश बहुत रास भी आएगी , लेकिन, हकीकत,जितना लिखा गया है उससे बुरी है।
चकित इस बात से हूं कि जिन्होंने इस बात की पड़ताल करने की जरूरत भी नहीं समझी वो आपकी टिप्पणी को हाथों–हाथ ले कर सत्ता प्रतिष्ठानों के बचाव में उछल रहे हैं।
बात सिर्फ इतनी है कि विनोद जी की सेहत पर चिंता किसी एजेंडा के तहत नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी के तहत उस औजार का इस्तेमाल करना है जो लोकतंत्र ने दिया है।
हां ! इस चिंता पर सवाल दागना लोकतंत्र के गिद्धों को जरूर रास आ रहा है !
और अंतिम बात।
क्षमा के साथ,चकित इस बात पर भी हूं भैया कि मेरे जिस संपादक ने ज़िंदगी भर किसी सवाल से मुंह नहीं मोड़ा वो आज कह रहे हैं – मत लिखो !
#vinod_kumar_shukla
(वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग के सोशल मीडिया से साभार)
