चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि वीरभद्र ने कहा- बाहरी आकर्षण के प्रति मोहित ना हो बल्कि भीतर की खूबसूरती को देखें
राजनांदगांव। जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि थोड़े से मीठे वचन बोलने से यदि किसी का बहुमान होता है तो फिर क्यों ना बोलें। मीठे शब्द मन के परिणाम निर्मल बनाते हैं। हम प्रवचन तीन कारणों से सुनते हैं- पहले मनोरंजन के लिए, दूसरा मनोमंथन के लिए और तीसरा मनोबंझन के लिए।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान कहा कि प्रवचन में कई लोग मनोरंजन के लिए आते हैं उन्हें लगता है कि प्रवचन में कहानी सुनने को मिलेगा, वहीं दूसरी तरह के श्रोता प्रवचन सुनने के बाद उस पर मंथन करते हैं। जबकि तीसरे प्रकार के श्रोता प्रवचन सुनते समय उसमें इतने तल्लीन हो जाते हैं कि अगल-बगल क्या हो रहा है, उन्हें पता ही नहीं चलता। प्रवचन सुनने से मन में विचारों की पवित्रता हर पल आगे बढ़ती रहती है। उन्होंने कहा कि अपने भीतर भी चिंतन में क्या बातें चल रही है उसे पर ध्यान आकृष्ट करें।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि प्रवचन,यह एक ऐसी क्लास है जिसका रिवीजन भी यहीं आकर करना होता है, बाहर जाकर कोई नहीं करता। उन्होंने कहा कि हम बाहरी आकर्षण के चलते धर्म से विरत होते जा रहे थे, ऐसे समय में हमारे पूर्वाचार्यों ने धर्म को बचाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि बाहरी आकर्षण के प्रति मोहित ना हो बल्कि भीतर की खूबसूरती को देखें और अपने धर्म के प्रति अटूट विश्वास रखें।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आगे फरमाया कि हम ध्यान में बैठते हैं तो हमारा मन कहीं और रहता है और दिमाग कहीं और। उन्होंने कहा कि जब तक चित्त व दिमाग एक रास्ते पर ना दौड़ने लग जाए तब तक सिद्धि नहीं मिल पाएगी। दोनों ही एक समान सोचे तो ही हम आत्म कल्याण के रास्ते में आगे बढ़ पाएंगे। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
