ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद जी विगत 2 दिसंबर से रायपुर के एम्स में भर्ती हैं। तब और अब में उनकी सेहत में बहुत गिरावट है।
उनके करीबी बताते हैं कि उनके मामले में रायपुर एम्स में सब कुछ अच्छा भी नहीं था।
सच तो यह है कि हम सब विनोद कुमार शुक्ल को बस धरोहर कहते रहे, उनके नाम पर सोशल मीडिया रंगते रहे लेकिन हकीकत तो सिर्फ उनका बेटा शाश्वत देखता रहा और खुद 102 बुखार में भी अपने पिता की तल्लीनता से सेवा में जुटा रहा !
बाकी तो सब विजिटर थे !!
बुरा लग सकता है लेकिन सच यह है कि विनोद जी को दुनिया का सबसे बढ़िया इलाज मिला नहीं !
ये जिम्मेदारी किसकी थी पता नहीं पर जिसकी भी थी उसने/उन्होंने/उन लोगों ने इस जिम्मेदारी को नहीं निभाया।
मैं चिकित्सकीय पैमाने पर इस बात को कहने के लिए सर्वथा अयोग्य व्यक्ति हूं पर मैंने या कुछ और ने जो महसूस किया बस उसे व्यक्त कर रहा हूं।
उम्र और बीमारी को देखते हुए मैं नहीं जानता कि अभी हमारे पास उनके सेहत को बेहतर करने का कितना अवसर है पर यह जानता हूं कि देश के प्रधानमंत्री के फोन, प्रदेश के मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री की विजिट के बावजूद तंत्र उन्हें लेकर संवेदनशील नहीं था।
यह बात मैं सूचनाओं के आधार पर पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं।
मैं कह सकता हूं कि 2 दिसंबर या उसके ठीक पहले अथवा ठीक बाद विनोद जी को देश के किसी बड़े चिकित्सकीय संस्थान में भर्ती करवाया जा सकता था।
वो संस्थान दिल्ली एम्स भी हो सकता था लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
रायपुर एम्स ने अपनी क्षमताओं के मुताबिक हर संभव प्रयत्न किया है, कर रहा है पर कोई वजह तो होती होगी कि रायपुर और दिल्ली के एम्स में एक फर्क देखा जाता है ।
प्रिय राष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवियों, विनोद जी के लिए चिंतित साहित्यजीवियों यह लिखने का समय है।
सिस्टम से आखिरी गुजारिश कर लीजिए।
(छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रूचिर गर्ग के सोशल मीडिया प्लेटफार्म से साभार)
