मुनि वीरभद्र ने कहा- दुख में समाधान निकालना आसान है किंतु सुख में सावधान रहना मुश्किल
राजनांदगाँव। “सारे व्यसनों को जीतने का एकमात्र उपाय है चारित्र जीवन। हम छोटे थे व्यसनमुक्त थे किंतु जैसे-जैसे बड़े होते गए हमें कुछ न कुछ व्यसन लगते गए। चारित्र जीवन हमें व्यसन से मुक्त करने के लिए है।” उक्त उद्गार जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में व्यक्त किये।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि मैं दुखी हूं तो दूसरों को दुख दूंगा और यदि सूखी हूं तो दूसरों को भी सुख देने का प्रयास करूंगा। उन्होंने कहा कि बाहरी चीजों से जुड़ाव ही दुख का कारण है। बाहरी चीजों का उपयोग जितना कम से कम हो सके करो। साधु भी बाहरी चीजों का उपयोग इसलिए कम करते हैं। जब तक दुख है भीतर हिंसा करनी पड़ेगी। हिंसा को रोकने के लिए भीतर के दुख को बाहर निकालें। दुख में समाधान निकालना आसान है किंतु सुख में सावधान रहना मुश्किल है।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जहां सुख दिखता है वहां पुरुषार्थ करने वाले कई पहुंच जाते हैं। ज्ञानियों का दृष्टिकोण आज तक हम समझ नहीं पाए। जितना काम ज्यादा है उतना ही आगे आनंद ज्यादा है। इन्होंने कहा कि चाहे जितनी भी प्रतिकूलता आ जाए साधु अपने जीवन में टिके रहता है। इसे ही चारित्र जीवन कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन तो जीवन में आते-जाते रहते हैं किंतु हम आत्मा के प्रति कभी जागृत नहीं हुए, हमें चारित्र जीवन के प्रति कभी लगाव नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यही भव है आत्मा के कल्याण करने का। हमें शरीर का ऑपरेशन करने वाला अच्छा लगता है तो फिर आत्मा का ऑपरेशन करने वाला भी अच्छा ही लगना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि चारित्र जीवन के लिए कल्पना जरूर करें और आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़े। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
