राजाओं ने बनाए थे दो तालाब
रानीसागर कई बार सूखा और फिर जीवंत हुआ पर बूढा़सागर को बर्बाद कर रहे अब हम
राजनांदगाँव। एक समय शहर की पहचान रहा ऐतिहासिक बूढा़सागर अब खत्म होने की स्थिति में आ गया है। ऐसी स्थिति के जिम्मेदार कोई और नहीं हम खुद हैं। हमने इस ऐतिहासिक धरोहर को खत्म होने की दिशा में खूब मेहनत की है। पहले हमने इस तालाब यानि बूढा़सागर को बेहतर बनाने के लिए यहाँ के लिए योजनाएँ बनाईं और उन योजनाओं पर अमल शुरू किया। फिर हमने योजनाओं पर ऐसा अमल किया कि जिस स्थल को संवारना था, बेहतर होना था, वो खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया। हम कौन हैं, हम शहर के नागरिक हैं, हम शहर के जनप्रतिनिधि हैं, हम शहर के अफसर हैं।
शहर में कई तालाब हैं। कुछ तालाब कई बरस पुराने हैं तो कुछ तालाब नए बने हैं। पर शहर के दो तालाब ऐसे हैं जिन्हें कई दशक पहले राजनांदगाँव रियासत यानि नांदगाँव रियासत के राजाओं ने बनाया था। राजाओं के महल यानि लालबाग पैलेस के नजदीक बूढा़सागर और राजाओं के दरबार के नजदीक रानीसागर। इन दो तालाबों में से एक रानीसागर की कहानी यह रही है कि यह बीते बरसों में कई बार सूखी है, लेकिन हर बार फिर से जीवंत हो गई है।
हाल के बरसों की बात करें तो रानीसागर 1960-70 के दशक की गर्मी में लगभग पूरी तरह सूख गई थी। इसके बाद इसकी सफाई हुई थी और फिर बरसात के मौसम में यह फिर से लबालब हो गई थी। इसके बाद 2010-20 के दशक में रानीसागर का सर्किट हाउस की ओर का हिस्सा सूखने पर इसके सिल्ट की सफाई कराई गई थी और फिर बारिश हुई तो रानीसागर में पहले से ज्यादा पानी भर गया।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले एक बार रानीसागर के सर्किट हाउस की ओर के हिस्से में चौपाटी बनाई गई थी और कुछ हिस्सा घेरा गया था लेकिन बूढा़सागर को हर दिन खत्म करने की साजिश होती रही है। न जनता ने, न नेताओं ने और न अफसरों से जानबूझकर ऐसा किया पर ऐसा हो रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर बूढा़सागर को काफी छोटा कर दिया गया और उसके काफी हिस्से को पाट कर वहाँ पार्क बना दिया गया। भीतर दुकानें निकाल दी गईं। हालाँकि पार्क किसी काम का नहीं रहा और दुकानें कभी खुली नहीं। इसके बगल में लालबाग जाने वाले रास्ते में बूढा़सागर के काफी हिस्से को पाट कर समतल कर दिया गया। लालबाग में राजा का महल था जो कब का बदहाल होकर टूट गया और यहाँ की जमीनें बेच दी गईं। शहर के शीतला माता मंदिर से राष्ट्रीय राजमार्ग जाने वाले हिस्से में भी बूढा़सागर के काफी बडे़ हिस्से को पाट दिया गया है। ये सब तो हो ही रहा है और अब बूढा़सागर के अस्तित्व की चिंता गहराने लगी है।
बीते कुछ समय से बूढा़सागर में पनप रहीं मछलियाँ धीरे धीरे मर रही हैं। रानीसागर और बूढा़सागर से मछलियाँ पकड़ने वाले मछुआरे बताते हैं कि शहर के नालों का गंदा पानी लगातार बूढा़सागर में जा रहा है और इसे रोकने कोई उपाय नहीं हो रहे हैं। इस वजह से तालाब की मछलियाँ मर रही हैं।
काफी समय पहले राज्य सरकार ने बूढा़सागर को सौंदर्यीकृत करने की योजना तैयार की थी और इसे अहमदाबाद के कांकरिया तालाब की तर्ज पर संवारने का काम शुरू किया गया था। तालाब में कचरा या जलकुंभी न जमा हो, इसके लिए काम किया जा यहा था और यहाँ वाटर फिल्टर प्लांट लगाने की योजना तैयार की गई थी लेकिन काम कोई ठोस नहीं हुआ और बूढा़सागर के नाम से करोड़ों रूपयों का बंदरबाट हो गया।
बहरहाल, अब नए सिरे से बूढा़सागर पर काम करने की जरूरत है। इसके लिए पहले बूढा़सागर में आकर मिल रहे शहर के गंदे पानी को रोकने का काम किया जाना होगा जिससे यहाँ की मछलियाँ जीवित रहें। इसके अलावा इसकी सफाई और वाटर ट्रिटमेंट प्लांट का काम कराना होगा।
(ये मैंने लिखा क्योंकि एक दिन पहले ही शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता भाई अनिल श्रीवास्तव ने मुझे इस पर डिटेल लेने कहा। फिर आज सुबह साथी भाई आलोक शर्मा से मुझे कुछ जानकारी मिली। फिर दोपहर में साथी भाई जयदीप शर्मा, साथी भाई बसंत शर्मा, साथी भाई लक्ष्मण लोहिया, साथी भाई राजू सोनी से कुछ जानकारी मिली। इसके बाद यह खबर बन पाई।)
