जगदलपुर। बस्तर दशहरा के इतिहास में एक बड़ा बदलाव आज दर्ज हो चुका है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहले गृहमंत्री हैं जिन्होंने मुरिया दरबार में प्रतिनिधियों की समस्याओं को सुना। इससे पहले यह काम बस्तर इस्टेट के महाराजा करते थे। महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के बाद इस दरबार में प्रदेश के मंत्री या मुख्यमंत्री प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।
बस्तर दशहरा, जो विश्व का सबसे लंबा 75 दिनों का त्योहार है, आदिवासी संस्कृति और शासन की एक अनूठी परंपरा को दर्शाता है। मुरिया दरबार (Muria Darbar) इसका केंद्रीय हिस्सा है, जो 1876 से चली आ रही राजकीय सभा का प्रतीक है। यहां बस्तर इस्टेट के परगनों (प्रशासनिक इकाइयों) के प्रतिनिधि अपनी समस्याएं रखते हैं और सामूहिक निर्णय लेते हैं।
मुरिया दरबार में शामिल होने वाले परगना और पदाधिकारी
बस्तर इस्टेट में कुल 84 परगने हैं। मुरिया दरबार में इन 84 परगनों के मांझी – परगना प्रमुख), मुखिया (जिन्हें – सहायक परगना प्रमुख या परगना आश्रित ग्राम प्रमुख कहा जाता है ), चालकी जिन्हें मांझी का सहायक कहा जाता है। इनके साथ अन्य आदिवासी प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। ये प्रतिनिधि गांवों की समस्याओं, प्रशासनिक मुद्दों और नए नीतियों पर चर्चा करते हैं।
दरबार में 450 से अधिक स्थानीय देवताओं (देवता प्रतिनिधि) का स्वागत और विदाई भी होती है, जो इन परगनों से जुड़े होते हैं।
शामिल होने का महत्व
परंपरा के अनुसार, सभी 84 परगनों के मांझी और मुखिया दरबार में भाग लेते हैं, जो आदिवासी एकता का प्रतीक है। यह सभा अब लोकतांत्रिक मंच बन चुकी है, जहां राजपरिवार के साथ प्रमुख तौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी मंच पर स्थान प्राप्त होता है।
बस्तर इस्टेट में 84 परगना हैं। ये ब्रिटिश काल की प्रशासनिक इकाइयां थीं, जो अब छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन (जिसमें बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव जिले शामिल हैं) के तहत वितरित हैं।
मालगुजारी (Malguzari)
यह ब्रिटिश काल का भूमि राजस्व प्रणाली थी, जिसमें मालगुज़ार (भूमि स्वामी या इकट्ठा करने वाले) किसानों से निश्चित कर (आमतौर पर 40-50% उपज) वसूलते थे। बस्तर इस्टेट में मालगुज़ारी की अधिकृत संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह 84 परगनों के अंतर्गत ही संचालित होती थी। वर्तमान में यह प्रणाली अप्रचलित है और आधुनिक भूमि रिकॉर्ड (जैसे मजकूर) से बदल चुकी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले केंद्रीय गृह मंत्री (और पहले केंद्रीय मंत्री) हैं, जो मुरिया दरबार में शामिल होने पहुंचे। 4 अक्टूबर 2025 को वे जगदलपुर पहुंचे और सिरहासर भवन में आयोजित दरबार में भाग लिया। यह ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि पहले यह सभा केवल बस्तर राजाओं या राज्य के मुख्यमंत्रियों तक सीमित रही।
अमित शाह ने आदिवासी प्रतिनिधियों के साथ भोजन किया, मिशन 2026 (नक्सल उन्मूलन) की समीक्षा की और महिलाओं के लिए ₹606.94 करोड़ की सहायता जारी की। बस्तर दशहरा समिति और मांझी ने उन्हें आमंत्रित किया था।
यह पूरा घटनाक्रम इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि करीब पांच दशक से माओवादी समस्या से ग्रसित बस्तर के माओवादी मुक्त क्षेत्र घोषित होने में अब महज छह माह का समय है… केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर दोहराया है कि 31 मार्च 2026 तक भारत से माओवादी की सशस्त्र हिंसा समाप्त हो जाएगी।
2023 से लेकर अब तक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह चौथी बार बस्तर के प्रवास पर पहुंचे हैं। यह भी एक रिकॉर्ड ही है। बस्तर केंद्र शासन के केंद्र में शामिल है। बस्तर के करीब-करीब 70 प्रतिशत इलाके से माओवादियों को पीछे हटने की नौबत आ गई है।
आज़ादी के बाद जिस तरह से पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशी रियासतों का विलय कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
आज़ादी के बाद सशस्त्र हिंसा के सहारे माओवादियों की सत्ता हासिल करने की कोशिशों को अंतिम तौर पर खात्मे की नौबत दिखाई दे रही है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सतत मॉनिटरिंग और डेडलाइन घोषित करने के बाद यह बड़ा बदलाव हुआ है। मुरिया दरबार से आज पूरे बस्तर को एक बड़ा संदेश देने की कामयाब कोशिश दिखाई दी है।
यह सनद रहे
(साभार सुरेश महापात्र, बस्तर)
