82वां नवआरक्षक दिक्षांत समारोह में आईजी अभिषेक शांडिल्य ने दिलाई कर्तव्य निष्ठा की शपथ
राजनांदगाँव। कभी घने जंगलों में बंदूकें थामकर पुलिस के खिलाफ खड़े होने वाले नक्सलियों ने आज उसी पुलिस बल की वर्दी पहनकर देश की सुरक्षा की शपथ लिया है। राजनांदगांव के पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय में 82 वें नव आरक्षक दीक्षांत परेड में यह बदला हुआ रूप सामने आया। समर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुके कई पूर्व नक्सली अब कानून व्यवस्था की रक्षा के लिए तैयार खड़े हुए।
इस वर्ष बुनियादी पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय में कुल 284 महिला-पुरुष नव आरक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर पास आऊट हुए हैं लेकिन सबसे अधिक ध्यान खींचा उन चेहरों ने, जिन्होंने कभी नक्सली संगठनों की राह पकड़ ली थी। इनमे 28 आत्मसमर्पित और 18 नक्सल पीडि़त परिवार से हैं। ये सभी नव आरक्षक बस्तर के सुकमा, कोंडागांव और दंतेवाड़ा जैसे अंदरूनी नक्सल प्रभावित इलाकों से थे।
11 महीनों की कठोर ट्रेनिंग के बाद ये नए जवान बेहतरीन प्रशिक्षण प्राप्त कर नव आरक्षक बने हैं और देश सेवा की शपथ ली है। आत्मसमर्पित नक्सली जो अब नव आरक्षक बने उनमें सुमित्रा साहू, रज्जो तोमनी और बीजापुर के रामसुता मह का कहना है कि वे कभी बंदूकों के साये में जीवन बिताते थे और गुमराह हो गए थे लेकिन जंगल का जीवन और खून-खराबा पसंद नहीं आया। दस-बारह साल नक्सल संगठन में रहने के बाद समझ आया कि असली सुकून तो शांति और समाज की सेवा में है। आज हमें गर्व है कि पुलिस ने हमें अपनाया और देश सेवा का मौका दिया। उनका कहना है अब देश के लिए नक्सलियों से लडा़ई लडेंगे।
समारोह के मुख्य अतिथि राजनांदगांव रेंज आईजी अभिषेक शांडिल्य ने पास-आउट हुए नव आरक्षकों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं और कहा कि यह परेड सिर्फ प्रशिक्षण का समापन नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। खासकर उन युवाओं के लिए जो हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौटे हैं। उन्होने कहा कि ये अब छग पुलिस का हिस्सा होंगे और देश की सेवा करेंगे।
पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय के एसपी गजेन्द्र सिंह ने बताया कि 284 नव आरक्षकों में सरेंडर नक्सली, अनुकम्पा नियुक्ति वाले उम्मीदवार और सामान्य भर्ती के युवा शामिल हैं, जिन्होंने 11 महीनों का कठिन बुनियादी प्रशिक्षण पूरा किया है।
यह दीक्षांत समारोह केवल वर्दी पहनने का क्षण नहीं था बल्कि यह उन लोगों की जीत थी जिन्होंने हिंसा की राह छोड़कर समाज की सुरक्षा का संकल्प लिया है। जंगल से जनसेवा तक की यह यात्रा बताती है कि बदलाव हमेशा संभव है, बस एक कदम सही दिशा में बढ़ाने की देर है।
