चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि वीरभद्र ने कहा- मोक्ष पाने के लिए भीतर के सफर को जारी रखना होगा
राजनांदगांव। जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि स्वरूप बदलता रहता है। हमने जब जन्म लिया था तब हमारा वजन 6 पाउंड था किंतु अब हम 60 किलो के हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यह पुद्गल, पुद्गल बन जाए उससे पहले हम अपना कार्य कर ले। हमें भौतिक जगत की सार्थकता को समझनी होगी।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान कहा कि साधु के लिए जन और स्वजन सब एक समान होते हैं, कहीं कोई भेदभाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि जिस दिन से आप इस भव में आए हो, उस दिन से आप अपने स्वरूप को भूल गए हो। अभी हमारी स्थिति नीचे है इसलिए हमें सबकी जरूरत है, शरीर की जरूरत है,ज्ञान की जरूरत है, गुरु की जरूरत है जिस दिन हम टॉप पर पहुंच गए तो हमें किसी भी चीज की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने कहा कि जब जीव टॉप क्वालिटी का हो जाता है तो उसे किसी आलंबन की जरूरत नहीं पड़ती।
जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने फरमाया कि अपने मन में समर्पण का भाव होना चाहिए तभी हमें महावीर मिलेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक अपने को अपना भान ना हो तब तक हम आत्म कल्याण के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकते। उन्होंने कहा कि मोक्ष वास्तविक में दूर नहीं है, वह हमारे काफी निकट है किंतु कहीं ना कहीं से हमारा उसके पास जाना नहीं हो पा रहा है। हमें अंदर के सफर को जागृत करना होगा और यदि सफल जागृत हो गया तो फिर मोक्ष दूर नहीं। अपनी स्थिति तो यही है कि हम दुनिया को हंसा रहे हैं लेकिन हम स्वयं नहीं हंस पा रहे। दरअसल हमने आराधना की शक्तियों को समझा ही नहीं इसलिए हम उत्पन्न परिस्थितियों से घबरा जाते हैं। जब तक इंसान, इंसान के भाव को नहीं समझता तब तक हम सब जीवों को सुखी नहीं बना सकते किन्तु हम जितने को भी सुखी बना सकते हैं, अवश्य बनाएं। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
