भव्य ज्योत विसर्जन के साथ हुआ नवरात्रि पर्व का समापन
राजनांदगाँव/डोंगरगढ़। विश्व प्रसिध्द मां बम्लेश्वरी मंदिर में ज्योति कलश विजर्सन के साथ भक्ति और आस्था के पर्व का समापन बीती रात संपन्न हुआ। सुबह 3 बजे तक ज्योति कलशों के विसर्जन का कार्यक्रम चलता रहा। देर रात 11 बजे माई ज्योत जैसे ही बाहर निकली कार्यकर्ताओं का जोश माता के नारों के रूप में दिखाई दिया।
पूरा मंदिर माता के जयकारों से गूंज उठा। धीरे धीरे सभी कमरो में रखी ज्योति कलश बाहर निकाली गई। कतार बध्द होकर महिलाएं विसर्जन के लिए निकलीं। इस दृष्य को देखने के लिए अंचल सहित महाराष्ट्र के हजारों श्रध्दालु उपस्थित थे। धर्मनगरी डोंगरगढ़ एक बार फिर भक्ति और आस्था के रंग में रंगी नजर आई। नवरात्र महापर्व के अंतिम दिन नवमी तिथि पर विश्वप्रसिद्ध मां बमलेश्वरी धाम में आस्था और विश्वास का अद्भुत संगम देखने को मिला। मां शक्ति की उपासना का यह पर्व मनोकामना ज्योत कलश विसर्जन के साथ संपन्न हुआ। जिसकी भव्यता और अद्वितीय परंपरा को देखने लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़े।
डोंगरगढ़ की धरती सदियों से मां बम्लेश्वरी देवी की महिमा और भक्ति का केंद्र रही है। यहां प्रत्येक वर्ष चैत्र और क्वांर नवरात्र में जिस श्रद्धा और आस्था के साथ भक्तजन मां का आह्वान करते हैं वह अद्वितीय है। इन्हीं में से एक परंपरा है ज्योत कलश विसर्जन की जिसे भक्तगण आस्था का महापर्व भी कहते हैं।
इस वर्ष भी डोंगरगढ़ के छोटी मां बम्लेश्वरी मंदिर में 901 एवं शीतला मंदिर में मनोकामना ज्योत कलश स्थापित कर प्रज्वलित किए गए। विसर्जन दिवस पर रात्रि मे जब माताएं अपने सिर पर ज्योत कलश रखकर यात्रा प्रारंभ करती हैं तो पूरा नगरी भक्ति रस में डूब जाती है। मां बम्लेश्वरी मंदिर से लेकर प्राचीन महावीर तालाब तक का मार्ग दीपमालाओं से जगमगा उठता है और जय माता दी के जयकारों से गूंजती रहती है। यात्रा का एक विशेष दृश्य यह भी है कि जब महिलाएं सिर पर ज्योत लेकर मुंबई हावड़ा रेलमार्ग की पटरियों को पार करती हैं, तब रेलवे प्रशासन स्वयं ट्रेनों का संचालन रोक देता है। यह दृश्य केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि आस्था की उस शक्ति को दर्शाता है जिसके आगे सब कुछ थम जाता है।
माना जाता है कि मां बम्लेश्वरी धाम में मनोकामना ज्योत की परंपरा कई शताब्दियों पुरानी है। मान्यता है कि मां बम्लेश्वरी की महिमा से प्रेरित होकर यहां मंदिर का निर्माण राजा द्वारा कराया गया था। तब से ही ज्योत प्रज्वलन और विसर्जन की यह परंपरा शुरू हुई। तब से लेकर आज तक हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इसी परंपरा में शामिल होकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
आस्था और राजनीति का संगम
इस भव्य आयोजन में इस वर्ष स्थानीय विधायक हर्षिता स्वामी बघेल ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने स्वयं मां की ज्योत सिर पर रखकर विसर्जन यात्रा में भाग लिया और महावीर तालाब में आस्था की ज्योत का विसर्जन किया। उनके इस सहभाग ने श्रद्धालुओं के बीच संदेश दिया कि मां की भक्ति में सब एक समान हैं। बघेल 2016 में विवाह के पश्चात से ही अनवरत ज्योति कलश धारण कर रही हैं। यह एक उनकी आस्था का पराक्रम है।
माई ज्योत का मिलन
आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण और अद्वितीय क्षण तब होता है जब मां बम्लेश्वरी धाम में प्रज्वलित माई ज्योत का संगम मां शीतला मंदिर की माई ज्योत से होता है। इस दृश्य को देखने के लिए आसपास के गांवों और जिलों से हजारों श्रद्धालु विशेष रूप से डोंगरगढ़ पहुंचते हैं। यह संगम आस्था और परंपरा का ऐसा अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है जिसे देखकर हर भक्त अभिभूत हो उठती है। अनूठा नजारा रात्रि 8 बजे से प्रारंभ हुआ यह आयोजन देर रात तक चला। तालाब किनारे लाखों दीपों की ज्योत जब पानी की लहरों पर झिलमिलाती है। तो मानो पूरा वातावरण अलौकिक और स्वर्गिक प्रतीत होती है। भक्तों का मानना है कि इस दृश्य के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप कट जाते हैं और मां की कृपा सदैव बनी रहती है। डोंगरगढ़ का ज्योत विसर्जन कार्यक्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, एकता और भक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। यह वह अवसर है जब संपूर्ण नगर और भक्तगण मां शक्ति की शरण में लीन हो जाते हैं और मां से प्रदेश की खुशहाली, परिवार की समृद्धि और जनकल्याण की कामना करते हैं।
