मुनि वीरभद्र ने कहा कि स्वाद के चक्कर में हमने घर को रेस्टोरेंट बना दिया
राजनांदगांव। “हम कल्पना करें कि यह वस्तु अच्छी और यह वस्तु खराब है। यह जरूरी नहीं कि जो वस्तु हमें अच्छी लगे वह वस्तु घर के लोगों को भी अच्छी लगे। हमने कल्पना की इसलिए कर्म बंद बना। हम जो खा रहे हैं, वही रस के भाव हैं। इस स्वाद के चक्कर में हमने घर को रेस्टोरेंट बना दिया है।” उक्त उदगार आज प्रख्यात संत वीरभद्र (विराग मुनि) ने जैन बगीचा स्थित उपाश्रय भवन में व्यक्त किये।
वीरभद्र मुनि (विराग) जी ने कहा कि साधु रस से जितना दूर रहे अच्छा है और वे रस से दूर भी रहते हैं। उन्होंने कहा कि हम हर चीज रस पूर्वक खा रहे हैं। हमें इसी रस को तोड़ना है। हमारी रोज नई जिज्ञासा रहती कि आज हम क्या खाएंगे। घर में खाने पीने की चीजें बहुत होती है। जीभ के स्वाद के लिए हमने घर को रेस्टोरेंट बना दिया है। इस रसना के लिए हम क्या-क्या नहीं कर रहे हैं! इस रसना पर यदि कमान कस लें तो सब ठीक हो जायेगा।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि यह सब बाहरी चीज हैं और हम बाहरी चीजों के स्वाद के लिए भटकते हैं, जबकि हमें हमारे भीतर की आत्मा को स्वाद देना चाहिए। उसे मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए ताकि वह कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ें। उन्होंने कहा कि हम कितने लालची बनते जा रहे हैं, कब इस शरीर का अंत आ जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि इस रसना के रस पर लगाम लगाने की कोशिश करें और आत्मा को रस प्रदान कर आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ जाएं। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
